।। जय श्री सीताराम जी ।।
॥ श्रीरामरक्षास्तोत्रम् ॥
श्रीगणेशायनम: ।
अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य ।
बुधकौशिक ऋषि: ।
श्रीसीतारामचंद्रोदेवता ।
अनुष्टुप् छन्द: । सीता शक्ति: ।
श्रीमद्हनुमान् कीलकम् ।
श्रीसीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ॥
विनियोगः
अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः।
श्रीसीतारामचन्द्रो देवता।
अनुष्टुप् छन्दः।
सीता शक्तिः।
श्रीमद् हनुमान् कीलकम्।
श्रीरामचन्द्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः॥
सरल अर्थ: इस राम रक्षा स्तोत्र के ऋषि बुधकौशिक हैं, श्री सीतारामचन्द्र इसके देवता हैं, अनुष्टुप इसका छन्द है, सीता जी इसकी शक्ति हैं और हनुमान जी इसका कीलक हैं। श्रीरामचन्द्र जी की प्रसन्नता के लिए इसका पाठ किया जाता है।
🌹 ध्यानम्
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं
पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्।
वामाङ्कारूढसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम्॥
अर्थ: मैं भगवान श्रीराम का ध्यान करता हूँ—जिनकी भुजाएँ घुटनों तक हैं, हाथों में धनुष-बाण हैं, जो पद्मासन में विराजमान हैं और पीले वस्त्र धारण किए हैं। जिनके नेत्र खिले हुए कमल के समान सुंदर हैं, जिनका स्वरूप मेघ के समान श्याम है और जो अनेक आभूषणों से सुशोभित हैं। जिनकी बाईं ओर माता सीता विराजमान हैं और जिनकी जटाओं का मुकुट अत्यंत शोभायमान है।
🙏 अथ श्रीरामरक्षास्तोत्रम्
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्॥ १॥
अर्थ: श्री रघुनाथ जी का चरित्र करोड़ों कल्पों तक भी पूरी तरह वर्णित नहीं किया जा सकता। उनके चरित्र का प्रत्येक अक्षर मनुष्य के बड़े से बड़े पापों का नाश करने वाला है।
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम्॥ २॥
अर्थ: नीले कमल के समान श्यामवर्ण, कमल जैसे नेत्रों वाले, माता जानकी और लक्ष्मण जी के साथ तथा जटाओं के मुकुट से सुशोभित श्रीराम का ध्यान करना चाहिए।
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तञ्चरान्तकम्।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्॥ ३॥
अर्थ: जो हाथ में तलवार, तरकश, धनुष और बाण धारण करते हैं तथा राक्षसों का संहार करने वाले हैं। जो स्वयं अजन्मा और सर्वव्यापक होते हुए भी अपनी लीला से संसार की रक्षा करने के लिए श्रीराम रूप में प्रकट हुए हैं।
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम्।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः॥ ४॥
अर्थ: बुद्धिमान व्यक्ति को इस राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। यह पापों का नाश करने वाला और शुभ इच्छाओं को पूर्ण करने वाला है। मेरे सिर की रक्षा रघुवंश के श्रीराम करें और मेरे मस्तक की रक्षा दशरथ जी के पुत्र श्रीराम करें।
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः॥ ५॥
अर्थ: मेरी आँखों की रक्षा माता कौसल्या के पुत्र श्रीराम करें। मेरे कानों की रक्षा विश्वामित्र जी के प्रिय श्रीराम करें। मेरी नाक की रक्षा यज्ञों की रक्षा करने वाले श्रीराम करें और मेरे मुख की रक्षा लक्ष्मण जी से अत्यंत प्रेम करने वाले श्रीराम करें।
जिह्वां विद्यािनिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः।
स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः॥ ६॥
अर्थ: मेरी जिह्वा की रक्षा ज्ञान के भंडार श्रीराम करें। मेरे कंठ की रक्षा भरत जी द्वारा पूजित श्रीराम करें। मेरे कंधों की रक्षा दिव्य अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाले श्रीराम करें और मेरी भुजाओं की रक्षा शिवजी के धनुष को तोड़ने वाले श्रीराम करें।
करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित्।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः॥ ७॥
अर्थ: मेरे हाथों की रक्षा माता सीता के पति श्रीराम करें। मेरे हृदय की रक्षा परशुराम जी को पराजित करने वाले श्रीराम करें। मेरी कमर की रक्षा खर-दूषण का संहार करने वाले श्रीराम करें और मेरी नाभि की रक्षा जाम्बवान जी के आश्रयदाता श्रीराम करें।
सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः।
ऊरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत्॥ ८॥
अर्थ: मेरी कमर की रक्षा सुग्रीव के स्वामी श्रीराम करें। मेरी जाँघों की रक्षा हनुमान जी के प्रभु श्रीराम करें। मेरी दोनों ऊरुओं की रक्षा रघुकुल में श्रेष्ठ तथा राक्षस कुल का विनाश करने वाले श्रीराम करें।
जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तकः।
पादौ बिभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः॥ ९॥
अर्थ: मेरे घुटनों की रक्षा समुद्र पर सेतु बनाने वाले श्रीराम करें। मेरी पिंडलियों की रक्षा रावण का अंत करने वाले श्रीराम करें। मेरे पैरों की रक्षा विभीषण को राज्य और सम्मान देने वाले श्रीराम करें और मेरे पूरे शरीर की रक्षा स्वयं भगवान श्रीराम करें।
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्॥ १०॥
अर्थ: जो पुण्यात्मा व्यक्ति श्रीराम की शक्ति से युक्त इस राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करता है, वह दीर्घायु, सुखी, संतानवान, विजयी और विनम्र होता है।
पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः॥ ११॥
अर्थ: जो प्राणी पाताल, पृथ्वी या आकाश में विचरण करते हैं अथवा छल-कपट से चलते हैं, वे भी राम नाम से सुरक्षित व्यक्ति को देख तक नहीं सकते।
रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्।
नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति॥ १२॥
अर्थ: जो मनुष्य राम, रामभद्र या रामचन्द्र नाम का स्मरण करता है, वह पापों से लिप्त नहीं होता और संसार में सुख प्राप्त करने के साथ अंततः मुक्ति भी प्राप्त करता है।
जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्।
यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः॥ १३॥
अर्थ: जिस व्यक्ति के कंठ में संसार को जीतने वाले राम नाम का यह रक्षा कवच रहता है, उसके हाथ में सभी सिद्धियाँ आ जाती हैं।
वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्।
अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम्॥ १४॥
अर्थ: जो इस राम कवच का स्मरण करता है, वह वज्र के पिंजरे के समान सुरक्षित रहता है। उसके कार्यों में बाधाएँ कम होती हैं और उसे विजय तथा मंगल की प्राप्ति होती है।
आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः।
तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः॥ १५॥
अर्थ: भगवान शिव ने स्वप्न में बुधकौशिक ऋषि को जिस प्रकार इस राम रक्षा स्तोत्र की आज्ञा दी, उसी प्रकार ऋषि ने प्रातःकाल जागने पर इसे लिख दिया।
आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम्।
अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान् स नः प्रभुः॥ १६॥
अर्थ: श्रीराम कल्पवृक्षों के समान सुख देने वाले, सभी विपत्तियों को समाप्त करने वाले और तीनों लोकों को आनंद देने वाले हैं। ऐसे श्रीसम्पन्न प्रभु श्रीराम हमारे रक्षक हों।
तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ॥ १७॥
अर्थ: श्रीराम और लक्ष्मण दोनों युवा, अत्यंत सुंदर, कोमल किंतु महान बलशाली हैं। उनके नेत्र विशाल कमल के समान हैं और वे वल्कल तथा मृगचर्म धारण किए हुए हैं।
फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥ १८॥
अर्थ: वे फल-मूल का सेवन करने वाले, इन्द्रियों को वश में रखने वाले, तपस्वी और ब्रह्मचारी हैं। वे राजा दशरथ के पुत्र तथा आपस में भाई—श्रीराम और लक्ष्मण हैं।
शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्।
रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ॥ १९॥
अर्थ: श्रीराम और लक्ष्मण सभी प्राणियों को शरण देने वाले और सभी धनुर्धरों में श्रेष्ठ हैं। वे राक्षस कुल का विनाश करने वाले हैं। वे दोनों श्रेष्ठ रघुवंशी हमारी रक्षा करें।
आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषङ्गसङ्गिनौ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम्॥ २०॥
अर्थ: हे राम और लक्ष्मण! आप दोनों धनुष पर बाण चढ़ाए, हाथों में बाण लिए और अक्षय तरकश धारण किए हुए सदैव मेरे आगे-आगे चलकर मेरी रक्षा करें।
सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा।
गच्छन्मनोरथोऽस्माकं रामः पातु सलक्ष्मणः॥ २१॥
अर्थ: कवच धारण किए हुए, तलवार, धनुष और बाण से सुसज्जित युवा श्रीराम, लक्ष्मण जी के साथ हमारे सभी शुभ मनोरथों की रक्षा करें और उन्हें पूर्ण करें।
रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली।
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः॥ २२॥
अर्थ: दशरथ जी के पुत्र, वीर, लक्ष्मण जी के साथ रहने वाले, बलशाली, काकुत्स्थ वंश के श्रेष्ठ, पूर्ण पुरुष और कौसल्या जी के पुत्र श्रीराम की मैं वंदना करता हूँ।
वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः।
जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः॥ २३॥
अर्थ: श्रीराम वेदांत द्वारा जाने जाने वाले, यज्ञों के स्वामी, सनातन पुरुषोत्तम, माता जानकी के प्रिय और अपार पराक्रम वाले भगवान हैं।
इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः॥ २४॥
अर्थ: जो भक्त श्रद्धापूर्वक प्रतिदिन इन नामों का जाप करता है, वह अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक पुण्य प्राप्त करता है—इसमें कोई संदेह नहीं।
रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम्।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नराः॥ २५॥
अर्थ: जो दूर्वा के समान श्यामवर्ण, कमलनयन और पीताम्बरधारी श्रीराम के दिव्य नामों का स्तवन करते हैं, वे संसार के बंधनों से ऊपर उठते हैं।
रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरम्।
काकुत्स्थं करुणामयं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्।
राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथतनयं श्यामलं शान्तिमूर्तिम्।
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्॥ २६॥
अर्थ: मैं लक्ष्मण जी के बड़े भाई, रघुवंश में श्रेष्ठ, माता सीता के पति, सुंदर, करुणामय, गुणों के भंडार, ब्राह्मणों के प्रिय, धर्मपरायण, राजा दशरथ के पुत्र, सत्य के पालन करने वाले, श्यामवर्ण, शांत स्वरूप, समस्त संसार को आनंद देने वाले, रघुकुल के तिलक और रावण के शत्रु भगवान श्रीराम को प्रणाम करता हूँ।
रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥ २७॥
अर्थ: श्रीराम, रामभद्र, रामचन्द्र, सृष्टि के रचयिता, रघुनाथ और समस्त जगत के स्वामी तथा माता सीता के पति श्रीराम को मेरा प्रणाम है।
श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम।
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम।
श्रीराम राम शरणं भव राम राम॥ २८॥
अर्थ: हे श्रीराम! हे रघुकुल को आनंद देने वाले! हे भरत जी के बड़े भाई! हे रणभूमि में पराक्रमी प्रभु! आप ही मेरे आश्रय हैं। हे राम, मुझे अपनी शरण में रखिए।
श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि।
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये॥ २९॥
अर्थ: मैं मन से श्रीरामचन्द्र जी के चरणों का स्मरण करता हूँ, वाणी से उनका नाम लेता हूँ, सिर झुकाकर उनके चरणों को प्रणाम करता हूँ और उन्हीं श्रीरामचन्द्र जी के चरणों की शरण ग्रहण करता हूँ।
माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः।
स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुः।
नान्यं जाने नैव जाने न जाने॥ ३०॥
अर्थ: श्रीराम ही मेरी माता हैं, श्रीराम ही मेरे पिता हैं। श्रीराम ही मेरे स्वामी और श्रीराम ही मेरे सच्चे मित्र हैं। मेरे लिए सब कुछ दयालु श्रीराम ही हैं। उनके अतिरिक्त मैं किसी अन्य को अपना सर्वस्व नहीं मानता।
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम्॥ ३१॥
अर्थ: जिनके दाईं ओर लक्ष्मण जी, बाईं ओर माता सीता और सामने हनुमान जी विराजमान हैं, उन रघुनन्दन श्रीराम को मैं प्रणाम करता हूँ।
लोकाभिरामं रणरङ्गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥ ३२॥
अर्थ: जो पूरे संसार को प्रिय हैं, रणभूमि में अत्यंत धीर और वीर हैं, जिनके नेत्र कमल के समान हैं, जो रघुवंश के स्वामी और करुणा के साक्षात स्वरूप हैं—ऐसे करुणामय श्रीरामचन्द्र जी की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥ ३३॥
अर्थ: जो मन के समान तीव्र गति वाले, वायु के समान वेगवान, जितेन्द्रिय, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, पवनपुत्र और वानर सेना के प्रमुख हैं—उन श्रीरामदूत हनुमान जी की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।
कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम्।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्॥ ३४॥
अर्थ: जो मधुर स्वर में "राम-राम" का उच्चारण करते हुए कविता रूपी वृक्ष की शाखा पर बैठे कोयल के समान हैं, उन महर्षि वाल्मीकि जी को मैं प्रणाम करता हूँ।
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्॥ ३५॥
अर्थ: जो सभी विपत्तियों को दूर करने वाले, सभी प्रकार की सम्पत्ति देने वाले और पूरे संसार को आनंद देने वाले हैं, उन श्रीराम को मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ।
भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम्।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम्॥
अर्थ: "राम-राम" का उच्चारण संसार रूपी जन्म-मरण के बीज को जला देता है, सुख-सम्पत्ति प्रदान करता है और यमदूतों के भय को दूर कर देता है।
रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे।
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहम्।
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर॥
अर्थ: राजाओं में श्रेष्ठ भगवान श्रीराम सदैव विजयी हों। मैं लक्ष्मीपति श्रीराम का भजन करता हूँ। श्रीराम ने राक्षसों की सेना का संहार किया, उन श्रीराम को मेरा प्रणाम है। श्रीराम से बढ़कर मेरा कोई दूसरा आश्रय नहीं है। मैं श्रीराम का दास हूँ। मेरा मन सदा श्रीराम में ही लगा रहे। हे प्रभु राम! मेरा उद्धार कीजिए।
॥ इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
श्रीगणेशायनम: ।
अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य ।
बुधकौशिक ऋषि: ।
श्रीसीतारामचंद्रोदेवता ।
अनुष्टुप् छन्द: । सीता शक्ति: ।
श्रीमद्हनुमान् कीलकम् ।
श्रीसीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ॥
विनियोगः
अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः।
श्रीसीतारामचन्द्रो देवता।
अनुष्टुप् छन्दः।
सीता शक्तिः।
श्रीमद् हनुमान् कीलकम्।
श्रीरामचन्द्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः॥
सरल अर्थ: इस राम रक्षा स्तोत्र के ऋषि बुधकौशिक हैं, श्री सीतारामचन्द्र इसके देवता हैं, अनुष्टुप इसका छन्द है, सीता जी इसकी शक्ति हैं और हनुमान जी इसका कीलक हैं। श्रीरामचन्द्र जी की प्रसन्नता के लिए इसका पाठ किया जाता है।
🌹 ध्यानम्
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं
पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्।
वामाङ्कारूढसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम्॥
अर्थ: मैं भगवान श्रीराम का ध्यान करता हूँ—जिनकी भुजाएँ घुटनों तक हैं, हाथों में धनुष-बाण हैं, जो पद्मासन में विराजमान हैं और पीले वस्त्र धारण किए हैं। जिनके नेत्र खिले हुए कमल के समान सुंदर हैं, जिनका स्वरूप मेघ के समान श्याम है और जो अनेक आभूषणों से सुशोभित हैं। जिनकी बाईं ओर माता सीता विराजमान हैं और जिनकी जटाओं का मुकुट अत्यंत शोभायमान है।
🙏 अथ श्रीरामरक्षास्तोत्रम्
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्॥ १॥
अर्थ: श्री रघुनाथ जी का चरित्र करोड़ों कल्पों तक भी पूरी तरह वर्णित नहीं किया जा सकता। उनके चरित्र का प्रत्येक अक्षर मनुष्य के बड़े से बड़े पापों का नाश करने वाला है।
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम्॥ २॥
अर्थ: नीले कमल के समान श्यामवर्ण, कमल जैसे नेत्रों वाले, माता जानकी और लक्ष्मण जी के साथ तथा जटाओं के मुकुट से सुशोभित श्रीराम का ध्यान करना चाहिए।
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तञ्चरान्तकम्।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्॥ ३॥
अर्थ: जो हाथ में तलवार, तरकश, धनुष और बाण धारण करते हैं तथा राक्षसों का संहार करने वाले हैं। जो स्वयं अजन्मा और सर्वव्यापक होते हुए भी अपनी लीला से संसार की रक्षा करने के लिए श्रीराम रूप में प्रकट हुए हैं।
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम्।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः॥ ४॥
अर्थ: बुद्धिमान व्यक्ति को इस राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। यह पापों का नाश करने वाला और शुभ इच्छाओं को पूर्ण करने वाला है। मेरे सिर की रक्षा रघुवंश के श्रीराम करें और मेरे मस्तक की रक्षा दशरथ जी के पुत्र श्रीराम करें।
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः॥ ५॥
अर्थ: मेरी आँखों की रक्षा माता कौसल्या के पुत्र श्रीराम करें। मेरे कानों की रक्षा विश्वामित्र जी के प्रिय श्रीराम करें। मेरी नाक की रक्षा यज्ञों की रक्षा करने वाले श्रीराम करें और मेरे मुख की रक्षा लक्ष्मण जी से अत्यंत प्रेम करने वाले श्रीराम करें।
जिह्वां विद्यािनिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः।
स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः॥ ६॥
अर्थ: मेरी जिह्वा की रक्षा ज्ञान के भंडार श्रीराम करें। मेरे कंठ की रक्षा भरत जी द्वारा पूजित श्रीराम करें। मेरे कंधों की रक्षा दिव्य अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाले श्रीराम करें और मेरी भुजाओं की रक्षा शिवजी के धनुष को तोड़ने वाले श्रीराम करें।
करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित्।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः॥ ७॥
अर्थ: मेरे हाथों की रक्षा माता सीता के पति श्रीराम करें। मेरे हृदय की रक्षा परशुराम जी को पराजित करने वाले श्रीराम करें। मेरी कमर की रक्षा खर-दूषण का संहार करने वाले श्रीराम करें और मेरी नाभि की रक्षा जाम्बवान जी के आश्रयदाता श्रीराम करें।
सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः।
ऊरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत्॥ ८॥
अर्थ: मेरी कमर की रक्षा सुग्रीव के स्वामी श्रीराम करें। मेरी जाँघों की रक्षा हनुमान जी के प्रभु श्रीराम करें। मेरी दोनों ऊरुओं की रक्षा रघुकुल में श्रेष्ठ तथा राक्षस कुल का विनाश करने वाले श्रीराम करें।
जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तकः।
पादौ बिभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः॥ ९॥
अर्थ: मेरे घुटनों की रक्षा समुद्र पर सेतु बनाने वाले श्रीराम करें। मेरी पिंडलियों की रक्षा रावण का अंत करने वाले श्रीराम करें। मेरे पैरों की रक्षा विभीषण को राज्य और सम्मान देने वाले श्रीराम करें और मेरे पूरे शरीर की रक्षा स्वयं भगवान श्रीराम करें।
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्॥ १०॥
अर्थ: जो पुण्यात्मा व्यक्ति श्रीराम की शक्ति से युक्त इस राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करता है, वह दीर्घायु, सुखी, संतानवान, विजयी और विनम्र होता है।
पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः॥ ११॥
अर्थ: जो प्राणी पाताल, पृथ्वी या आकाश में विचरण करते हैं अथवा छल-कपट से चलते हैं, वे भी राम नाम से सुरक्षित व्यक्ति को देख तक नहीं सकते।
रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्।
नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति॥ १२॥
अर्थ: जो मनुष्य राम, रामभद्र या रामचन्द्र नाम का स्मरण करता है, वह पापों से लिप्त नहीं होता और संसार में सुख प्राप्त करने के साथ अंततः मुक्ति भी प्राप्त करता है।
जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्।
यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः॥ १३॥
अर्थ: जिस व्यक्ति के कंठ में संसार को जीतने वाले राम नाम का यह रक्षा कवच रहता है, उसके हाथ में सभी सिद्धियाँ आ जाती हैं।
वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्।
अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम्॥ १४॥
अर्थ: जो इस राम कवच का स्मरण करता है, वह वज्र के पिंजरे के समान सुरक्षित रहता है। उसके कार्यों में बाधाएँ कम होती हैं और उसे विजय तथा मंगल की प्राप्ति होती है।
आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः।
तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः॥ १५॥
अर्थ: भगवान शिव ने स्वप्न में बुधकौशिक ऋषि को जिस प्रकार इस राम रक्षा स्तोत्र की आज्ञा दी, उसी प्रकार ऋषि ने प्रातःकाल जागने पर इसे लिख दिया।
आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम्।
अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान् स नः प्रभुः॥ १६॥
अर्थ: श्रीराम कल्पवृक्षों के समान सुख देने वाले, सभी विपत्तियों को समाप्त करने वाले और तीनों लोकों को आनंद देने वाले हैं। ऐसे श्रीसम्पन्न प्रभु श्रीराम हमारे रक्षक हों।
तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ॥ १७॥
अर्थ: श्रीराम और लक्ष्मण दोनों युवा, अत्यंत सुंदर, कोमल किंतु महान बलशाली हैं। उनके नेत्र विशाल कमल के समान हैं और वे वल्कल तथा मृगचर्म धारण किए हुए हैं।
फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥ १८॥
अर्थ: वे फल-मूल का सेवन करने वाले, इन्द्रियों को वश में रखने वाले, तपस्वी और ब्रह्मचारी हैं। वे राजा दशरथ के पुत्र तथा आपस में भाई—श्रीराम और लक्ष्मण हैं।
शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्।
रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ॥ १९॥
अर्थ: श्रीराम और लक्ष्मण सभी प्राणियों को शरण देने वाले और सभी धनुर्धरों में श्रेष्ठ हैं। वे राक्षस कुल का विनाश करने वाले हैं। वे दोनों श्रेष्ठ रघुवंशी हमारी रक्षा करें।
आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषङ्गसङ्गिनौ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम्॥ २०॥
अर्थ: हे राम और लक्ष्मण! आप दोनों धनुष पर बाण चढ़ाए, हाथों में बाण लिए और अक्षय तरकश धारण किए हुए सदैव मेरे आगे-आगे चलकर मेरी रक्षा करें।
सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा।
गच्छन्मनोरथोऽस्माकं रामः पातु सलक्ष्मणः॥ २१॥
अर्थ: कवच धारण किए हुए, तलवार, धनुष और बाण से सुसज्जित युवा श्रीराम, लक्ष्मण जी के साथ हमारे सभी शुभ मनोरथों की रक्षा करें और उन्हें पूर्ण करें।
रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली।
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः॥ २२॥
अर्थ: दशरथ जी के पुत्र, वीर, लक्ष्मण जी के साथ रहने वाले, बलशाली, काकुत्स्थ वंश के श्रेष्ठ, पूर्ण पुरुष और कौसल्या जी के पुत्र श्रीराम की मैं वंदना करता हूँ।
वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः।
जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः॥ २३॥
अर्थ: श्रीराम वेदांत द्वारा जाने जाने वाले, यज्ञों के स्वामी, सनातन पुरुषोत्तम, माता जानकी के प्रिय और अपार पराक्रम वाले भगवान हैं।
इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः॥ २४॥
अर्थ: जो भक्त श्रद्धापूर्वक प्रतिदिन इन नामों का जाप करता है, वह अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक पुण्य प्राप्त करता है—इसमें कोई संदेह नहीं।
रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम्।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नराः॥ २५॥
अर्थ: जो दूर्वा के समान श्यामवर्ण, कमलनयन और पीताम्बरधारी श्रीराम के दिव्य नामों का स्तवन करते हैं, वे संसार के बंधनों से ऊपर उठते हैं।
रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरम्।
काकुत्स्थं करुणामयं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्।
राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथतनयं श्यामलं शान्तिमूर्तिम्।
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्॥ २६॥
अर्थ: मैं लक्ष्मण जी के बड़े भाई, रघुवंश में श्रेष्ठ, माता सीता के पति, सुंदर, करुणामय, गुणों के भंडार, ब्राह्मणों के प्रिय, धर्मपरायण, राजा दशरथ के पुत्र, सत्य के पालन करने वाले, श्यामवर्ण, शांत स्वरूप, समस्त संसार को आनंद देने वाले, रघुकुल के तिलक और रावण के शत्रु भगवान श्रीराम को प्रणाम करता हूँ।
रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥ २७॥
अर्थ: श्रीराम, रामभद्र, रामचन्द्र, सृष्टि के रचयिता, रघुनाथ और समस्त जगत के स्वामी तथा माता सीता के पति श्रीराम को मेरा प्रणाम है।
श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम।
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम।
श्रीराम राम शरणं भव राम राम॥ २८॥
अर्थ: हे श्रीराम! हे रघुकुल को आनंद देने वाले! हे भरत जी के बड़े भाई! हे रणभूमि में पराक्रमी प्रभु! आप ही मेरे आश्रय हैं। हे राम, मुझे अपनी शरण में रखिए।
श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि।
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये॥ २९॥
अर्थ: मैं मन से श्रीरामचन्द्र जी के चरणों का स्मरण करता हूँ, वाणी से उनका नाम लेता हूँ, सिर झुकाकर उनके चरणों को प्रणाम करता हूँ और उन्हीं श्रीरामचन्द्र जी के चरणों की शरण ग्रहण करता हूँ।
माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः।
स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुः।
नान्यं जाने नैव जाने न जाने॥ ३०॥
अर्थ: श्रीराम ही मेरी माता हैं, श्रीराम ही मेरे पिता हैं। श्रीराम ही मेरे स्वामी और श्रीराम ही मेरे सच्चे मित्र हैं। मेरे लिए सब कुछ दयालु श्रीराम ही हैं। उनके अतिरिक्त मैं किसी अन्य को अपना सर्वस्व नहीं मानता।
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम्॥ ३१॥
अर्थ: जिनके दाईं ओर लक्ष्मण जी, बाईं ओर माता सीता और सामने हनुमान जी विराजमान हैं, उन रघुनन्दन श्रीराम को मैं प्रणाम करता हूँ।
लोकाभिरामं रणरङ्गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥ ३२॥
अर्थ: जो पूरे संसार को प्रिय हैं, रणभूमि में अत्यंत धीर और वीर हैं, जिनके नेत्र कमल के समान हैं, जो रघुवंश के स्वामी और करुणा के साक्षात स्वरूप हैं—ऐसे करुणामय श्रीरामचन्द्र जी की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥ ३३॥
अर्थ: जो मन के समान तीव्र गति वाले, वायु के समान वेगवान, जितेन्द्रिय, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, पवनपुत्र और वानर सेना के प्रमुख हैं—उन श्रीरामदूत हनुमान जी की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।
कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम्।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्॥ ३४॥
अर्थ: जो मधुर स्वर में "राम-राम" का उच्चारण करते हुए कविता रूपी वृक्ष की शाखा पर बैठे कोयल के समान हैं, उन महर्षि वाल्मीकि जी को मैं प्रणाम करता हूँ।
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्॥ ३५॥
अर्थ: जो सभी विपत्तियों को दूर करने वाले, सभी प्रकार की सम्पत्ति देने वाले और पूरे संसार को आनंद देने वाले हैं, उन श्रीराम को मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ।
भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम्।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम्॥
अर्थ: "राम-राम" का उच्चारण संसार रूपी जन्म-मरण के बीज को जला देता है, सुख-सम्पत्ति प्रदान करता है और यमदूतों के भय को दूर कर देता है।
रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे।
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहम्।
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर॥
अर्थ: राजाओं में श्रेष्ठ भगवान श्रीराम सदैव विजयी हों। मैं लक्ष्मीपति श्रीराम का भजन करता हूँ। श्रीराम ने राक्षसों की सेना का संहार किया, उन श्रीराम को मेरा प्रणाम है। श्रीराम से बढ़कर मेरा कोई दूसरा आश्रय नहीं है। मैं श्रीराम का दास हूँ। मेरा मन सदा श्रीराम में ही लगा रहे। हे प्रभु राम! मेरा उद्धार कीजिए।
॥ इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥